बाडागड्डी क्षेत्र की दो दिवसीय पौराणिक शैल यात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब, क्षेत्र की सुख-समृद्धि और विश्व कल्याण की हुई कामना उत्तरका

उत्तरकाशी, 5 अगस्त | चंद्रप्रकाश बहुगुणा

देवभूमि उत्तराखंड की पहचान उसकी समृद्ध लोक परंपराओं, धार्मिक आस्था और प्रकृति से गहरे जुड़ाव में निहित है। इन्हीं परंपराओं को जीवंत बनाए रखने वाली भगवान हुणेश्वर महादेव एवं हरि महाराज की दो दिवसीय पावन शैल यात्रा इस वर्ष भी श्रद्धा, संस्कृति और प्रकृति के अद्भुत संगम की साक्षी बनी। बाडागड्डी क्षेत्र में आयोजित इस ऐतिहासिक यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

शुभ मुहूर्त में ग्राम कुरौली से यात्रा का शुभारंभ हुआ। भगवान हरि महाराज, जिन्हें कार्तिकेय स्वामी के रूप में भी पूजा जाता है, की सुसज्जित डोली बोंगाडी, कंकराडी और किशनपुर गांवों से होते हुए हरुन्ता सौड़ बुग्याल पहुंची। पूरे मार्ग में ढोल-दमाऊँ, रणसिंघा और देव जयकारों की गूंज से वातावरण भक्तिमय बना रहा।

यात्रा के दौरान घने देवदार के जंगल, मखमली बुग्याल, कल-कल बहते झरने और हिमालय की मनोरम चोटियां श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र बनी रहीं। मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक गांव में देव डोली का फूल-मालाओं से भव्य स्वागत किया गया, जिससे पूरी यात्रा श्रद्धा और लोकसंस्कृति के रंग में रंगी नजर आई।

हरुन्ता सौड़ बुग्याल पहुंचने पर क्षेत्र के देवी-देवताओं का पारंपरिक विधि-विधान से दूधाभिषेक किया गया। स्थानीय मान्यता है कि इस पवित्र अनुष्ठान से प्रकृति प्रसन्न होती है तथा क्षेत्र में समय पर वर्षा, अच्छी फसल, पशुधन की सुरक्षा और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

इस अवसर पर पूर्व विधायक विजयपाल सजवाण ने कहा कि सदियों पुरानी यह शैल यात्रा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता की अमूल्य धरोहर है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

यात्रा में गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान, जिला पंचायत अध्यक्ष रमेश चौहान, डुंडा ब्लॉक प्रमुख राजदीप परमार सहित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, ग्राम प्रधान और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। सभी ने क्षेत्र, प्रदेश और विश्व में सुख, शांति, समृद्धि तथा प्राकृतिक संतुलन की कामना की।

बाडागड्डी की यह शैल यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति के प्रति आस्था का जीवंत प्रतीक है। यह परंपरा संदेश देती है कि जब आस्था, प्रकृति और समाज एक सूत्र में बंधते हैं, तभी समृद्धि और सामाजिक सौहार्द का मार्ग प्रशस्त होता है।

आयोजकों ने कहा कि आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में जहां अनेक लोक परंपराएं विलुप्त होने के कगार पर हैं, वहीं हुणेश्वर महादेव और हरि महाराज की शैल यात्रा आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति संरक्षण, सामाजिक भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का संदेश देती रहेगी।

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