उत्तराखंड में 30 साल में 1,641 वर्ग किमी घटा बर्फीला क्षेत्र, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

देहरादून। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में बर्फ से ढके भू-भाग में पिछले तीन दशकों के दौरान बड़ा बदलाव सामने आया है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) और ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1992 से 2022 के बीच राज्य में बर्फ से ढका क्षेत्र करीब 1,640.82 वर्ग किलोमीटर घटा है।

शोधकर्ताओं ने वर्ष 2002 से 2025 के बीच प्रकाशित 177 महत्वपूर्ण शोध पत्रों का विश्लेषण कर उत्तराखंड में भूमि उपयोग और भू-आवरण में हो रहे बदलावों का आकलन किया। अध्ययन में बर्फीले क्षेत्र के साथ-साथ वनस्पति, निर्मित क्षेत्र और खुले भू-भाग में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन दर्ज किए गए हैं।

🌨️ बर्फीले क्षेत्र में बड़ी कमी

अध्ययन के मुताबिक 1992 में उत्तराखंड में बर्फ से ढका क्षेत्र लगभग 14,951.98 वर्ग किमी था, जो 2022 में घटकर करीब 13,311.16 वर्ग किमी रह गया। यानी लगभग 1,640.82 वर्ग किमी की कमी दर्ज हुई।

बर्फ और हिम क्षेत्र में बदलाव का सीधा संबंध हिमालयी जल व्यवस्था से माना जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और हिम का पिघलना नदियों तथा जलस्रोतों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे बदलाव लंबे समय में जल सुरक्षा, पारिस्थितिकी और स्थानीय आजीविका को प्रभावित कर सकते हैं।

🏗️ दूसरी ओर बढ़ रहा निर्मित क्षेत्र

रिपोर्ट में उत्तराखंड में निर्मित क्षेत्र के विस्तार की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। 1992 से 2022 के बीच निर्मित क्षेत्र में करीब 485.69 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं वनस्पति आवरण में लगभग 584.24 वर्ग किलोमीटर की कमी सामने आई।

राजधानी देहरादून में शहरी विस्तार विशेष रूप से तेजी से बढ़ा है। रिस्पना नदी बेसिन से जुड़े अध्ययनों में लगभग 15 वर्षों के दौरान शहरीकरण में 71 प्रतिशत वृद्धि का उल्लेख किया गया है। इससे बारिश के पानी के प्राकृतिक बहाव में बदलाव और बाढ़ के जोखिम को लेकर भी चिंता बढ़ी है।

🌳 केवल क्षेत्रफल नहीं, जंगलों की गुणवत्ता भी चिंता

अध्ययन में वन क्षेत्र में मामूली वृद्धि का उल्लेख है, लेकिन शोधकर्ताओं ने जंगलों के विखंडन और गुणवत्ता में गिरावट को गंभीर विषय बताया है। जंगलों का बस्तियों, कृषि और अन्य उपयोगों में बदलना वन्यजीवों के आवास और उनके बीच प्राकृतिक संपर्क को प्रभावित कर सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव इन पर्यावरणीय जोखिमों को और बढ़ा सकता है। इससे भूस्खलन, बाढ़, मिट्टी के कटाव और जल संसाधनों पर दबाव जैसी चुनौतियां बढ़ने की आशंका है।

🛰️ अब रियल टाइम निगरानी पर जोर

शोधकर्ताओं ने तेजी से बदलते हिमालयी भू-दृश्य की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग, GIS और AI आधारित मॉडल के इस्तेमाल पर जोर दिया है। इसके साथ ही केवल उपग्रह आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय मैदानी सर्वेक्षण और स्थानीय समुदायों की जानकारी को भी शामिल करने की जरूरत बताई गई है।

संवेदनशील क्षेत्रों में संरक्षण आधारित भूमि उपयोग, अनियंत्रित शहरी विस्तार पर नियंत्रण और भूस्खलन व बाढ़ की आशंका वाले वाटरशेड की विशेष निगरानी को भी जरूरी बताया गया है।

🌏 हिमालय के लिए बड़ा संकेत

विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड में हो रहे ये बदलाव केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं हैं। इनका संबंध जल सुरक्षा, जैव विविधता, कृषि, पर्यटन, स्थानीय आजीविका और आपदा जोखिम से भी है। इसलिए विकास योजनाओं में पर्यावरणीय संवेदनशीलता को प्राथमिकता देते हुए वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर दीर्घकालिक योजना बनाना जरूरी है।

उत्तराखंड का हिमालय केवल बर्फ और जंगलों का क्षेत्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जल और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ा प्राकृतिक तंत्र है। ऐसे में बदलते हिमालय की लगातार निगरानी और संतुलित विकास समय की जरूरत है।

#Uttarakhand #उत्तराखंड #Himalaya #ClimateChange #SnowCover #Environment #Dehradun #HimalayanEcosystem #Glacier #जलसुरक्षा #पर्यावरण #उत्तराखंडन्यूज

!-- Google tag (gtag.js) -->