हरिद्वार, 7 मार्च (रिपोर्टर: चंद्रप्रकाश बहुगुणा)। हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पर आधारित सात दिवसीय कार्यशाला का शनिवार को समापन हो गया। कार्यशाला में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि यदि हम स्वदेशी तकनीकों और अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटें, तो न केवल सामाजिक समावेश मजबूत होगा, बल्कि आधुनिक समाज में बढ़ रही मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का भी समाधान संभव है।
कार्यशाला के अंतिम सत्र को संबोधित करते हुए देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि आज विश्व जिन अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, उनका स्थायी समाधान भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में निहित है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व केवल एक उपासना पद्धति ही नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक जीवन दृष्टि भी है, जो “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना के साथ विकसित भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है।
डॉ. पण्ड्या ने कहा कि हमारे प्राचीन पाठ्य और मौखिक ग्रंथ केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि जीवन को सही दिशा में जीने की कला सिखाने वाले ज्ञान के भंडार हैं। भारत का समग्र विकास केवल आर्थिक पैमानों पर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन से ही संभव है।
कार्यशाला के दौरान पं. दीनदयाल उपाध्याय मेमोरियल हेल्थ साइंसेज एवं आयुष विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ के कुलपति प्रो. पी. के. पात्रा, बागलकोट विश्वविद्यालय, कर्नाटक के कुलपति प्रो. आनंद सरडा देशपांडे, हसन विश्वविद्यालय, कर्नाटक के कुलपति प्रो. टी.सी. तारानाथ, तमिल विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की डॉ. एस. कविता, डॉ. एस. संगीता तथा यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र की डॉ. रश्मि रानाडे सहित कई विषय विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परंपरा और उसके आधुनिक संदर्भों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
समापन समारोह में डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने अतिथियों को देव संस्कृति विश्वविद्यालय और शांतिकुंज का प्रतीक चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। वहीं कार्यशाला में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने और उसे आधुनिक शिक्षा व जीवन में लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
